दीपका/एसईसीएल दीपका प्रबंधन की लापरवाही एक बार फिर उजागर हो गई है। ब्लास्टिंग के दौरान उड़े पत्थर की चपेट में आकर सड़क से गुजर रहे निर्दोष ग्रामीण लखन पटेल (निवासी – रेकी) की दर्दनाक मौत हो गई।
हादसा कल दोपहर हुआ, लेकिन जिम्मेदार अफसरों की संवेदनहीनता इतनी गहरी थी कि मुआवजे और आश्वासन के लिए ग्रामीणों को लगातार 7 घंटे तक घटना स्थल पर धरना देना पड़ा।
ब्लास्टिंग का समय, सुरक्षा घेरा और चेतावनी व्यवस्था – सब कुछ कागजों में सही, लेकिन हकीकत में लखन पटेल की मौत यह चीख-चीख कर बता रही है कि प्रबंधन सिर्फ फाइलों में सतर्क है, जमीन पर नहीं।
7 घंटे बाद जागा प्रबंधन, रात 11 बजे टूटा आंदोलन ग्रामीणों और परिजनों के आक्रोश ने जब सड़क जाम का रूप लिया, तब प्रशासन और एसईसीएल के अधिकारी मौके पर पहुंचे।
कटघोरा एसडीएम रोहित सिंह ने बताया कि परिजनों की मांग पर सहमति बनी मृतक के परिवार को 10 लाख रुपये मुआवजा
परिवार के एक सदस्य को एसईसीएल की कलिंगा कंपनी में नौकरी।रात करीब 11 बजे आंदोलन समाप्त हुआ, लेकिन सवाल अब भी जिंदा हैं।“करे कोई, भरे कोई” –
हरदी बाजार और आस पास के ग्रामीणों के मुताबिक “इस क्षेत्र में ऐसे कई परिवार हैं जो ब्लास्टिंग से प्रभावित हुए, लेकिन आज भी मुआवजे के लिए दर-दर भटक रहे हैं। लखन पटेल की मौत कोई पहली घटना नहीं है, फिर भी प्रबंधन सबक लेने को तैयार नहीं।”
ब्लास्टिंग से पहले सड़क मार्ग को बंद क्यों नहीं किया गया? आपको बता दे कि अमानक ब्लास्टिंग की वजह से इतनी दूर तक पत्थर उछल कर आया जिसका अंदाजा ब्लास्ट करने वाले जिम्मेदारों को नहीं थी।
सेफ्टी जोन और सायरन सिर्फ दिखावे के लिए हैं क्या?
क्या हर मौत के बाद ही मुआवजा और नौकरी दी जाएगी?
कब तक निर्दोष ग्रामीण एसईसीएल की लापरवाही की कीमत जान देकर चुकाते रहेंगे?
एसईसीएल दीपका प्रबंधन की लापरवाही ने एक परिवार का चिराग बुझा दिया।
मुआवजा और नौकरी से जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।
जरूरत है – जवाबदेही तय करने की, दोषियों पर कार्रवाई की और ब्लास्टिंग सिस्टम को सुरक्षित बनाने की।
वरना अगली खबर फिर किसी और की मौत पर ही लिखी जाएगी।

